दिल्ली में 2020 के उत्तर-पूर्वी दंगों के मामले में आरोपी उमर खालिद और अन्य लोगों को जमानत से इनकार किए जाने के बाद वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई से जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा के अलग होने और न्यायिक प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए हैं। कपिल सिब्बल ने कहा कि जस्टिस मिश्रा ने स्पष्ट रूप से कहा, ‘मैं यह मामला नहीं सुनूंगा’, और वैसे भी जो वहां गया है उसको पता है कि जज उनकी बात सुन ही नहीं रहे। इस मामले में कई बार सुनवाई टल चुकी है।’ उन्होंने सुप्रीम कोर्ट जाने की बात कही है और न्यायपालिका पर सवाल उठाए हैं।
कपिल सिब्बल के अनुसार, पिछले महीने जुलाई 2025 में एक बार स्वास्थ्य कारणों से और दूसरी बार अन्य कारणों से स्थगन मांगा गया, लेकिन उन्हें गलत तरीके से आरोपित किया जा रहा है कि उन्होंने सात बार स्थगन की मांगा है।
सिब्बल ने देश की न्यायिक और लोकतांत्रिक स्थिति पर सवाल उठाते हुए कहा कि राजनीतिक दल इस तरह के मुद्दों को उठाने से बच रहे हैं, क्योंकि उन्हें डर है कि यह उनके राजनीतिक हितों को नुकसान पहुंचा सकता है. सिब्बल ने एक कहा कि हम सही काम करने और इसके लिए आवाज उठाने से हिचक रहे हैं। हमारे वकील, मध्यम वर्ग और समाज खामोश हैं।
उन्होंने पूर्व मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ के उस बयान पर भी निशाना साधा, जिसमें उन्होंने कथित तौर पर कहा था कि खालिद के वकील ने सात बार सुनवाई टालने की मांग की थी. सिब्बल ने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट में मामले की सुनवाई के दौरान केवल दो बार स्थगन मांगा गया था।
उन्होंने सवाल उठाया कि अगर कोर्ट वर्षों तक फैसला नहीं देता, तो क्या इसके लिए वकीलों को दोषी ठहराया जाएगा? अगर जमानत नहीं देनी है, तो याचिका खारिज कर दें। 20-30 सुनवाइयों की क्या जरूरत है? सिब्बल ने बताया कि उमर खालिद पिछले चार साल, 11 महीने और 15 दिनों से हिरासत में हैं। उनकी दो अपीलें- 2022 और 2024 में- हाईकोर्ट द्वारा खारिज की गईं और 2023 में दायर एक विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) को 2024 में वापस ले लिया गया। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने कई बार यह निर्देश दिया है कि जमानत याचिकाओं पर जल्द सुनवाई होनी चाहिए, लेकिन खालिद के मामले में ऐसा नहीं हुआ।
उन्होंने इस बात पर नाराजगी जताई कि उमर खालिद को जमानत न मिलने का ठीकरा केवल उनके वकील पर फोड़ा जा रहा है जो सही नहीं है। सिब्बल ने सवाल उठाया, ‘अगर जमानत नहीं देनी है तो मामले को खारिज कर दें। जमानत न देने का ये रवैया संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार) के खिलाफ है। ऐसा नहीं होना चाहिए।’
सिब्बल ने बताया कि उमर खालिद पर गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत मामला दर्ज है और इस कानून को असंवैधानिक घोषित करने के लिए एक रिट याचिका भी दायर की गई है। उन्होंने दलील दी कि उमर खालिद उस वक्त भिवंडी, मुंबई में भाषण दे रहे थे, जब दिल्ली में दंगे हो रहे थे, यानी वे घटनास्थल पर मौजूद भी नहीं थे। इसके बावजूद उन्हें जमानत नहीं मिल रही, जबकि अन्य मामलों में इसी तरह के आरोपों में शामिल लोगों को समय पर जमानत दी गई है। सिब्बल ने कई ऐसे मामलों की सूची भी पेश की, जहां UAPA के तहत आरोप तय होने के बावजूद आरोपियों को जमानत मिली।
सिब्बल ने अदालत के रुख पर भी आपत्ति जताई, जहां जजों का कहना है कि जल्दबाजी में कोई फैसला नहीं होना चाहिए। उन्होंने भरोसा जताया कि ट्रायल में सभी आरोपी बेकसूर साबित होंगे और रिहा होंगे। साथ ही उन्होंने सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि जिन मंत्रियों ने घृणा और वैमनस्य फैलाने वाले भाषण दिए, उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई, जबकि निर्दोषों को सलाखों के पीछे रखा जा रहा है।
सिब्बल ने कहा कि दिल्ली पुलिस के पास उत्तर-पूर्व दंगों की सारी वीडियोग्राफी मौजूद है और इसे कोर्ट में पेश किया जाए, लेकिन अभियोजन एजेंसी कोर्ट को वीडियो नहीं दिखाना चाहती। जो इस मामले की पारदर्शिता पर सवाल उठाता है.सिब्बल ने कहा कि उमर खालिद की जमानत याचिका खारिज करना संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है।
दिल्ली हाईकोर्ट ने बीते मंगलवार को फरवरी 2020 के दंगों से जुड़े एक यूएपीए मामले में उमर खालिद, शरजील इमाम समेत 10 आरोपियों को जमानत देने से साफ इनकार कर दिया.न्यायमूर्ति नवीन चावला और शालिंदर कौर की खंडपीठ ने नौ आरोपियों की जमानत याचिकाएं खारिज कीं, जबकि न्यायमूर्ति सुब्रमोनियम प्रसाद और न्यायमूर्ति हरीश वैद्यनाथन शंकर की पीठ ने तसलीम अहमद की याचिका खारिज की. दंगे में 53 लोगों की मौत हुई थी और 700 से अधिक लोग घायल हुए थे।
कोर्ट ने नौ जुलाई को आदेश सुरक्षित रखने के बाद मंगलवार को यह फैसला सुनाया। विस्तृत आदेश का इंतजार है। आरोपियों को 2020 से जेल में रखा गया है। सभी आरोपियों ने निचली अदालत से जमानत याचिकाएं खारिज किए जाने के बाद हाईकोर्ट का रुख किया था।
अभियोजन पक्ष ने जमानत याचिकाओं का विरोध करते हुए कहा कि यह पूर्व-नियोजित और सुविचारित साजिश का मामला है। उमर खालिद, शरजील इमाम, मोहम्मद सलीम खान, शिफा-उर-रहमान, अतहर खान, मीरान हैदर, अब्दुल खालिद सैफी, गुलफिशा फातिमा और शादाब अहमद की जमानत याचिकाएं हाईकोर्ट में 2022 से लंबित थीं।
पहली अपील में 180 दिनों में 28 सुनवाइयां हुईं और 2024 की अपील को खारिज होने में 407 दिन लगे. सिब्बल ने दावा किया कि खालिद के खिलाफ यूएपीए के तहत मुकदमा मुंबई में दिए गए उनके एक भाषण से संबंधित है, जिसमें कथित तौर पर भविष्य में हिंसा की आशंका जताई गई थी। उन्होंने कहा कि इस मामले में कोई प्रत्यक्ष सबूत नहीं है और यह किसी की हत्या, अपहरण या देश की क्षेत्रीय अखंडता पर हमले से संबंधित नहीं है।
सिब्बल ने यूएपीए के तहत जमानत पाने वाले अन्य मामलों का हवाला देते हुए कहा कि जब इन मामलों की सुनवाई होगी, तो ज्यादातर आरोपियों को बरी कर दिया जाएगा। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि भड़काऊ भाषण देने वाले नेताओं के खिलाफ कोई कार्रवाई क्यों नहीं हुई। सिब्बल ने कहा कि हमारी न्यायपालिका और सरकार की यह स्थिति है. हम कहां जाएं और क्या उम्मीद करें?
जस्टिस चंद्रचूड़ ने उमर खालिद की जमानत याचिका पर एक पत्रकार को दिए एक इंटरव्यू में कहा था, ‘मैं केस की मेरिट पर कोई टिप्पणी नहीं करना चाहता, लेकिन मैं आपको एक चीज जरूर बताऊंगा, जिसपर बहुत लोग ध्यान नहीं दे पाते, जब उमर खालिद केस की बात होती है…क्या आप सोच सकती हैं कि केस मुल्तवी किया गया था…ज्यादा नहीं तो कम से कम सात बार उमर खालिद की ओर से पेश होने वाले वकीलों ने आगे की तारीखें मांगी थीं और आखिरकार जमानत याचिका वापस ले ली गई.कपिल सिब्बल ने इस आरोप का प्रेस वार्ता में विस्तार से जवाब दिया।
(जनचौक की रिपोर्ट।)